एक सोच मेरी भी

लेखन-- कला,प्रेरणा,चिंतन या कुछ और ?

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Gagan Jaiswal


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*************श्रद्धासुमन*************

Posted On: 23 May, 2010  
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एक सोच मेरी भी….

Posted On: 23 Mar, 2010  
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Hello world!

Posted On: 22 Mar, 2010  
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उन दिनों को मैं भूला नहीं हूँ जब मैंने अपनी आँखों से श्री श्री भगवान जी को फूटपाथ पर चूना बेचते देखा था। उन दिनों की स्मृति भी मेरे मानस-पटल पर आज भी ताज़ा है जब किराए की साइकिल लेकर वे हाकरी करने निकल पड़ते थे। अवध विश्वविद्यालय की स्थापना की पृष्ठभूमि में किसकी प्रखर भूमिका थी यह कौन नहीं जानता ? स्व० कमला पति त्रिपाठी जैसे धाकड़ मुख्यमंत्री की उपस्थिति में श्रीमती इन्दिरा गांधी के समक्ष वह कौन शख्स था जो सिंह गर्जना के साथ त्रिपाठी जी की ओर उंगली उठाकर आग्नेय नेत्रों से कह सके -- "पूछिए इन महाशय से ( त्रिपाठी जी से ) कि इन्होंने अवध विश्वविद्यालय की स्वीकृति का वायदा किया था या नहीं ? या फिर हमीं सब झूठ बोल रहे हैं ?" वह एक ऐतिहासिक क्षण था। त्रिपाठी जी को काटो तो खून नहीं। इंदिराजी ने पूछा तो उन्होंने सर हिला कर हामी भर दी । इन्दिरा जी ने तत्काल कहा - " आप निश्चिंत होकर जाएँ , अवध विश्वविद्यालय को स्वीकृति दे दी जायेगी । और त्रिपाठीजी की ओर मुखातिब होकर कहा कि इस सम्बन्ध में जल्द से जल्द आवश्यक कार्रवाई करके अवध विश्वविद्यालय की स्थापना की जाए और मुझे तत्काल इसकी पुष्टि भेजी जाय ।" ऐसी शख्सियत को लौह - पुरुष की संज्ञा न दिया जाना फैजाबाद के जन-समाज की मानसिक दुर्बलता ही कही जायेगी । जहां ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे स्वनामधन्य नेतालोग खुद को लौह-पुरुष कहलवाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाते फिरते हैं वहीं श्री श्री भगवान् जायसवाल जो सचमुच के लौह-पुरुष थे वह किसी की प्रशंसा के मोहताज नहीं थे और न ही यह उनका उद्देश्य था। वह तो निःस्वार्थ ढंग से अपना काम करते रहने के पक्षधर थे --- समाज की निःस्वार्थ सेवा ही उनका अभीष्ट था। शायद ऐसे ही महापुरुषों के लिए 'नजीर' ने लिखा था - " चल ऐ नजीर कुछ इस तरह से कारवां के साथ , कि जब तू न चल सके तो तेरी दास्ताँ चले..."

के द्वारा:

गगन जी, जिन्‍दगी हमें यूं ही नहीं मिल गई है। इसके लिए हम सभी को कुछ न कुछ चुकाना पडता है। पहले हमारे पूर्वजों ने चुकाया जिसका परिणाम हम आज देख रहे हैं। यह गाडी, बंगला, नाम, शोहरत और जाने क्‍या क्‍या उन्‍हीं के चुकाने का परिणाम है। हमें अपने पूर्वजों के योगदान को सिर्फ और सिर्फ याद करके उनके लिए आंसू नहीं बहाने चाहिए, बल्कि उस परम्‍परा को और भी आगे बढाना चाहिए, जो आपको पीढी दर पीढी मजबूत करती आई और ऐसे मुकाम पर लाकर खडा कर दिया कि जहां कभी आपके पिता जी और दादा जी खडे थे, अब आप की बारी है। अपेक्षाएं आपसे हैं, भविष्‍य की, तकदीर की, पीढी की, इन पर वैसे ही खरे उतरिये जैसे कि आपके पिता जी उतरे थे।

के द्वारा: SUNEEL PATHAK SUNEEL PATHAK

के द्वारा:

के द्वारा:

गगन भाई,लेख तो अच्छा लिखा है आपने,इस के लिए आप बधाई के पात्र है, पर जहाँ तक मैं समझता हूँ ,जैसे की आप जवान और समजदार लगते है, क्यों न एक आम लोगो की पार्टी बनाए जिसमे हर एरिया में हर गली मे "मानव कल्याण पार्टी " बनायीं जाए ,जिसमे सिर्फ ओउर सिर्फ आम इन्सान (सिर्फ आम middle क्लास के लोग हों ) जो मिलकर एक एक नेता (हरम खोर) नेता को मिलकर मरना शरू करे, और पब्लिक की मार का तो कोई इतना बड़ा केस भी नहीं बनता. बस एक बार अगर हम आम इन्सान अपनी ताकत को समज जाए, बस सिर्फ शुरुआत करनी है,एक बार आम इन्सान ने मिलकर इन गिने चुने हरम खोर मिनिस्टर्स को बिच सड़क पे मरना शुरू किया,दो / तीन मिनिस्टर्स के मर खाने के बाद सब कुछ अपने आप ठीक हों जायेगा . जागो आम हिन्दुस्तानियों जागो ! ! !

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के द्वारा: अजय सिंह, दैनिक जागरण, फैजाबाद अजय सिंह, दैनिक जागरण, फैजाबाद

के द्वारा: SUNEEL PATHAK SUNEEL PATHAK




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